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हरिप्रबोधिनी एकादशी

:-हरिप्रबोधिनी अथवा देवोत्थापिनी या दिठवन एकादशी :-
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष एकादशी को देवोत्थापिनी अथवा हरिप्रबोधिनी एकादशी कहते है। इस तिथि को चार मास का शयन समाप्त कर भगवान् विष्णु उठते हैं,इसीलिये इसे हरिप्रबोधिनी या देवोत्थापिनी एकादशी कहते हैं। भगवान् विष्णु के शयन के कारण आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीनों में विवाह आदि मंगल कार्य निषिद्ध होते हैं,और हरिप्रबोधिनी एकादशी के बाद से विवाह आदि मंगल कार्य प्रारम्भ हो जाते हैं।
सनातन धर्मनिष्ठ मनुष्य अधिकतर इस एकादशी को व्रत रखते हैं।
प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर पूरे दिन का अखण्ड व्रत रखें,फिर रात्रि के समय भगवान् की कथा या विष्णुस्तोत्र या सहस्रनाम का पाठ करके शंख घंटा,घड़ियाल आदि का वादन करते हुये भगवान् को जगाना चाहिये।
भगवान् को जगाने के पश्चात् भगवान् के मंदिर में सजावट करके भगवान् की षोडशोपचार से पूजन करना चाहिये,भगवान् को विविध प्रकार के नैवैद्य अर्पण करने चाहिये।व्रती को एकादशी की रात्रि में कथा-कीर्तन आदि करके द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करें।
इस वर्ष अर्थात सन् 2019 में हरिप्रबोधिनी एकादशी दिनाँक 08 नवम्बर दिन शुक्रवार को प्राप्त हो रही है।

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