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September 20, 2019
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September 21, 2019

जीवित्पुत्रिका व्रत क्यूँ और कब?

:-जीवित्पुत्रिका व्रत:-

जैसा नाम से हीं स्पष्ट है कि यह व्रत पुत्र के जीवन से संबन्धित है,पुत्रवती महिलाएं अपने पुत्र के दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं इस दिन माताएँ बिना जल के इस व्रत को पूर्ण करती हैं।माताओं की पुत्रों के प्रति आयुष्य कामना के उद्देश्य से किए व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से जाना जाता है।कहीं-कहीं इस व्रत को जीउतिया के नाम से भी जाना जाता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत के विधान के विषय में माता पार्वती द्वारा भगवान शंकर से प्रश्न किया गया तब भगवान शंकर ने माता पार्वती को संबोधित करते हुए कहा कि यह व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है।इस व्रत में अष्टमी तिथि के प्रदोषकाल में जीमूतवाहन की कथा का श्रवण किया जाता है।सदाशिव शंकर ने माता पार्वती को विधि-विधान बताते हुए कहा कि अष्टमी तिथि मे व्रत रहकर अष्टमी तिथि के प्रदोषकाल मे जीमूतवाहन की कथा का श्रवण करके आचार्य को दक्षिणा देकर अष्टमी तिथि के बाद व्रत का पारण करता है उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।
यह जीमूतवाहन कौन है और क्या है कथा है,इनकी आइये जानते हैं-
जीमूतवाहन गन्धर्वों के राजकुमार थे।उनके पिता जी ने वृद्धावस्था के आगमन के उपरान्त राज्य का उत्तरदायित्व अपने पुत्र जीमूतवाहन को सौप कर वन के लिए प्रस्थान किया परन्तु जीमूतवाहन का मन राज-पाट में नहीं लगा और उन्होने राज्य का उत्तरदायित्व भाइयों को सौपकर पिता की सेवा हेतु वन में गमन किया।वन में रहकर पिता की सेवा करते हुए उनका विवाह राजकन्या मलयवती के साथ हो गया।
एक दिन वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे निकल गए,आगे जाने पर उनको अचानक एक वृद्धा के रोने की आवाज सुनाई दी,आवाज के सहारे वृद्धा के पास पहुँचकर उन्होने उसके विलाप का कारण पूछा।वृद्धा ने बताया कि मैं नागवंश की स्त्री हूँ मेरे पास एक हीं पुत्र है।पक्षीराज गरूड़ के सामने नागों ने रोज एक नाग सौपने की प्रतिज्ञा की हुई है,आज मेरे पुत्र शंखचूड का बलि दिवस है,इसी संताप से व्यथित हूँ।माता के इस प्रकार के विलाप को सुनकर जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त किया कि मैं तुम्हारे पुत्र को बचाऊंगाऔर इसके स्थान पर मैं जाऊँगा,ऐसा कहकर जीमूतवाहन ने अपने आपको लाल कपड़े में लपेट कर निर्धारित वध्य शाला पर लेट गये।पक्षीराज गरूड़ आए और अपनी चोंच मे बढ़े हुए कपड़े में जीमूतवाहन को लेकर उड़ गये और पहाड़ के शिखर पर बैठकर जब मौत के मुँह में जाने वाले प्राणी की किसी प्रकार से विचलित न होते देखकर परिचय पूछा तब जीमूतवाहन ने पक्षीराज को अपना परिचय दिया,पक्षीराज ने जीमूतवाहन के दूसरे के प्राण रक्षा हेतु अपने को समर्पित करने के अदम्य साहस भरे कृत्य को देखकर उन्हें जीवनदान दिया साथ हीं नागों को भी अभयदान प्रदान किया।तब से हीं जीमूतवाहन के पूजन का विधान प्रारम्भ हुआ है।

     दिनाँक 22 सितम्बर दिन रविवार को उदयकाल में अष्टमी की प्राप्ति हो रही है,जो दोपहर 02:39 बजे तक है,उसके बाद नवमी का आगमन हो जा रहा है जो अगले दिन दिन में 01:22 बजे तक है।पारणा का समय नवमी में अगले दिन प्रातःकाल कर लेना होगा।
 अतः इस बार जीवित्पुत्रिका का व्रत  22 सितम्बर दिन रविवार को सम्पन्न होगा।जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण 23 सितम्बर 2019 सोमवार को प्रातःकाल किया जायेगा।

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